नेपाली बहादुर

प्रसिद्ध नेपाली साहित्यकार और नेपाल के शिक्षामंत्री रहे मोदनाथ प्रश्रित की ‘नेपाली बहादुर’ कविता ‘पक्षधर’ के पहले अंक (संपादक – दूधनाथ सिंह) 1975 में छपी थी । इस कविता और कुछ अन्य लेखों के चलते पहले नेपाल सरकार ने और तदन्तर भारत में आपातकाल लागू हो जाने से भारत सरकार ने, अंक को जब्त कर लिया । यह कविता अपने विवरण और तथ्यों में भले ही नेपाली कविता लगे, लेकिन अपनी संवेदनात्मक जमीन पर यह तीसरी दुनिया के लोगों की कविता है ।  बहुत छोटे-छोटे यथार्थ चित्रों से कविता आगे बढ़ती है । नाटकीयता का बहुत हल्का सा सूत्र इसे भारी नहीं होने देता ।  लेकिन, भावनात्मक अंत:सूत्रों में कविता और-और गहनतम होती जाती है ।  सिर झुकाकर झाड़ू लगाने का आदेश लेने वाली जनता अंतिम पंक्तियों में बन्दूक उठा लेती है । ‘पक्षधर’ का पहला अंक अब उपलब्ध नहीं है । आदरणीय दूधनाथ जी से उसकी एक प्रति किसी तरह पा सका और उनकी स्वीकृति से  ‘पक्षधर’ के पुनर्नवा अंक (अंक – 2 वर्ष 2007, बनारस, संपा॰- विनोद तिवारी) में यह ऐतिहासिक कविता  पुनः प्रकाशित है । फिर भी, बहुत लोगों की माँग पर यह कविता यहाँ प्रस्तुत की जा रही है :

 

बहादुर, जल्दी झाड़ू लगाओ ।

बहादुर, कुत्ते को अभी नहलाया कि नहीं

बहादुर अभी तक नाली साफ नहीं किया ?

बहादुर, बर्तन और कपड़े तुमने अभी तक नहीं धोये ?

बहादुर रात के दस बज गये

बंदूक लेकर फाटक पे खड़े हो जाओ

बहादुर, देखो !  वह देखो ! दुश्मन आ रहा है ।

जाओ जाओ जल्दी खत्म करो साले को !

बहादुर, तुम कितने गंदे हो । तुम बुद्धू हो ।

अरे ! दरिद्र देश के भूखे कुत्ते !

काहे को आये हियाँ

चलो– निकलो—भागो यहाँ से ।

 

सड़े हुए आम में मक्खियों की तरह ये शब्द

मेरे कानों के चारो ओर भिनभिना रहे हैं

लौट रहा हूँ मैं – अपने देश

पीढ़ी दर पीढ़ी के लम्बे युद्धों से थका हुआ,

कट गया है मेरा बाँया पैर

अभी नागा विद्रोहियों से हुए एक युद्ध में

और लाठी के सहारे

लौट रहा हूँ मैं – अपने देश ।

बीरगंज

सरहद पार लिखा है- नेपाल

आपका स्वागत करता है ।

कौन है यह ‘आप’- मैं

मैं कुछ नहीं जानता ।

 

घुसता हूँ भीतर बीरगंज बाजार में

देखता हूँ चारो ओर

चौचक सामान पटे हुए हैं

गौर से देखता हूँ चारों ओर

पर अपने देश का तो कुछ भी नहीं ।

आलीशान इमारतों के भीतर

विराज रहे हैं गद्दियों पर – आप बनकर

टाटा, बिड़ला के राजदूत

और वहाँ भी झाड़ू लगा रहा है

दरवानी कर रहा है

वही गोरखा बहादुर ।

 

एक छोटी सी भट्ठी मुझे देती है पनाह- रात को

देखता हूँ – विदेशी बनिये अपनी कारों में

हांगकांग, चीन व जापान के सामान

गाँजा-चरस और नेपाल की प्राचीन मूर्तियाँ

नोटों की गड्डियों से पाटकर – सरेआम

लौट रहे हैं – रक्सौल की ओर ।

 

नेपाली कस्टम का एक नाटा चौकीदार

एक रुपये पाकर ‘सलाम’ ठोंकता है।

और भारतीय कस्टम का एक सिपाही

पाँच का पत्ता पकड़कर गाड़ी बढ़ाने का संकेत देता है ।

 

बदबू भरे एक सँकरे कमरे में

खटमलों – मच्छरों से घिरा हुआ

छटपटाता रहता हूँ रात भर

और दूसरे कमरे से छनकर आ रही हैं

भट्ठी वाली औरत और एक लाहुरे की

हरकत-भरी आवाज़ें ।

 

रात के युवा हो जाने पर

सामने वाले महल से आवाज़ों के बवंडर उठते हैं

खिड़की से देखता हूँ-

नेपाल के बड़े अफ़सरान

भारत के धन्नासेठ और पश्चिम के हिप्पी लोग

एक हाथ में बोतल और दूसरे में युवती को पकड़कर

झूम-झूमकर नाच रहे हैं गा रहे हैं

झूम बराबर झूम शराबी — झूम बराबर झूम ।

फिर बत्तियाँ बुझ जाती हैं

और कोलाहल एक वहशत में बदल जाता है।

सुबह मुर्गे की बांग से पहले ही

गाड़ियों की आवाज़ें आने लगती हैं

बाहर निकलता हूँ – देखता हूँ

भारतीय सामान से लदी गाडियाँ

रक्सौल से आ पहुंची हैं।

 

शराब की दुकान से घिरा बीरगंज

मुर्दे की तरह सो रहा है

नेपाल के खुले प्रवेश द्वार से

गाडियाँ आ रही हैं-जा रही हैं

एक और पाँच का पत्ता पकड़ते हुए

सिपाही सलाम ठोंक रहे हैं।

 

आठ दस साल के नन्हें मुन्ने बहादुर

नौकरी की तलाश में प्रवेश द्वार से

बाहर निकल रहे हैं

और साठ सत्तर के बूढ़े लाहुरे

लंगड़ाते हुए-

अपने देश लौट रहे हैं

और बिरगंज सो रहा है ।

 

सोलह सत्रह की हिमाली युवतियाँ

कलकत्ता और बम्बई के चकलों के लिए

भगायी जा रही हैं।

और बीरगंज सो रहा है ।

क्या यह मुख्य द्वार बिरगंज

नेपाल का ही एक अंग है ?

 

उत्तर की ओर जाती हुई सड़क पर एक तख्ती लगी है

भारत के सहयोग से बनी हुई सड़क

लेकिन यह सड़क मुझे नहर लगती है

उत्तर से दक्षिण की ओर बहती हुई नहर

जहां नेपाल का ख़ून और पसीना

नेपाल की अपरंपार दौलत

जहाँ से नेपाल की वीरता और तरुणाई

सब बह कर पहुँचते हैं

विदेशी कुबेरों के खजाओं में ।

बस इसी तरह हमारे महराज का

विकास का उत्स फूटता है

और हम पीढ़ी दर पीढ़ी बन जाते हैं

होटल बहादुर, दरबान बहादुर, गोर्खा बहादुर ।

 

पहाड़ी रास्ते से चलता – चलता अपने छोटे से गाँव पहुंचा हूँ

बचपन की यादें मंडराती हैं चारो ओर

अपने गोचरन को देखकर

मेरा लंगड़ा पैर भी लंगड़ाना भूल जाता है।

किस तरह उल्लसित मैं पहुँचता हूँ घर

लेकिन कहाँ है मेरा घर

मेरी फूस की झुग्गी लेटी है धरती पर

मुँह के बल। चारों ओर सिर्फ एक

वीरानी फैली है ।

 

मेरी सांस मुझे धौंकनी बना देती है

और फिर मेरा शरीर पत्थर हो जाता है।

 

नीचे, मेरे चाचा बताते हैं-

माँ तेरी मर गयी पिछले जाड़े में

तेरे बच्चे की माँ —मुखिया और पुलिस के

कठिन बलात्कार के बाद …

कर लिया उस बेचारी ने एक रात आत्मघात ।

बड़ा लड़का प्रधान-पंच के घर हरवा हो गया है

और छोटा बेचारा भाग गया- उधर आसाम ।

तभी सुनाई पड़ता है काका के रेडियो से

प्रसारित महाराजाधिराज का भाषण –

राजतंत्र के भीतर तीव्र गति से

पार कर रहा है विकास की मंज़िलें – हमारा नेपाल

पृथ्वी का स्वर्ग बन रहा है नेपाल ।

 

पागलों की तरह मैं घूमता रहता हूँ गाँव की गलियों में

मेरा गाँव युवा –विहीन हो गया है

मेरे गाँव में सिर्फ विधवाएँ और लँगड़े लाहुरे रहते हैं

मेरा गाँव अनाथ बच्चों का गाँव हो गया है

मेरा गाँव मुर्दों का गाँव हो गया है ।

 

बहादुर, जल्दी झाड़ू लगाओ।

बहादुर, कुत्ते को अभी नहलाया कि नहीं ?

बहादुर अभी तक नाली और पखाना साफ नहीं किया ?

बहादुर, बर्तन और  कपड़े तुमने अभी तक नहीं धोये ?

बहादुर, वह देखो दुश्मन आ रहा है

जाओ— जल्दी खत्म करो साले को ।

बहादुर तुम कितने गन्दे हो— जाहिल कहीं के

अरे दरिंदे देश के भूखे कुत्ते

काहें को आये हियाँ —

 

वही आवाज़ों का शोर गलियों की गुहार

गंदी घृणा भरी पुकार —-

निकालकर फेक देता हूँ मैं जर्सी से

सीने पर टका हुआ तमगा।

क्या यही है मेरी बहादुरी की निशानी—

कौन से दुश्मनों को मारा है हमने अभी तक

कैसे हो गये हम बहादुर !

 

किस गन्दे कुत्ते को अभी तक नहलाते थे हम

हम तो खुद ही दुश्मन के पालतू कुत्ते बने थे

और सारी रात भों-भों कर उनकी तिजोरियों की रक्षा करते थे

उफ! कैसे बदनसीब हो गये हम नेपाली बहादुर—

गुलामी को शान और सौगात समझते हैं

और इसी गुलामी के लिए हमारे माँ-बाप

दशहरे पर हर साल देते हैं आशीर्वाद ।

 

हाँ साहब अभी तक निरे बुद्धू थे हम

दुश्मन की बन्दूक थाम दोस्तों पर गोलियाँ चलाते थे

और एक पीतल का टुकड़ा सीने में खोंसकर

छाती फुलाये अपने को सचमुच बहादुर समझते थे ।

 

लेकिन थूकता हूँ अब मैं ऐसी बहादुरी पर

ऐसी गुलाम बहादुरी पर

ऐसी हैवान बहादुरी पर

जिसने सिर्फ बेबसों को मारा है

जिसने सिर्फ मुक्तिकामी जवानों को मारा है

जिसने केवल लुटेरों के दुश्मनों को अभी तक मारा है ।

 

सुनों, संसार के साहबों !

अब हम सचमुच झाड़ू लागाएंगे

अब हम हम सचमुच नाली और पखाना साफ करेंगे

अब हम सचमुच बन्दूक उठाएंगे

अब हम सचमुच बन्दूक उठाएंगे

अब हम सचमुच दुश्मन को खत्म करेंगे

अब हम बहादुर —

वह होटल बहादुर नहीं

दरबान बहादुर नहीं

वह गोरखा बहादुर नहीं

नेपाली बहादुर, मुक्ति बहादुर, श्रमिक बहादुर

ऐसे झाड़ू लगाएंगे कि

हमारे देश में जाल फैलाकर हमी को फँसाने वाले

कीड़े-मकोड़े खत्म हो जाएँ

 

साफ कर देंगे देश का सारा कूड़ा-कर्कट ।

अब हम नालियों और पखाने तेज फ़िनायल से साफ करेंगे

जिससे मानवता की अँतड़ियों के सारे कीटाणु

खत्म हो जांय ।

 

सुनो, कान खोल के इस युग के कुबेरों !

हमने दुश्मनों को पहचान लिया है

अब हम सचमुच बन्दूक उठा रहे हैं

लेकिन इस बार उसकी नली उस दिशा में होगी

जिधर तुम हो ।

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