भारतभूषण अग्रवाल सम्मान से सम्मानित अदनान कफील दरवेश की कविता ‘क़िबला’ पर युवा आलोचक आशीष मिश्र का लेख

 

‘क़िबला’ के बहाने घरेलू श्रम पर बातचीत – आशीष मिश्र

है परे सरहद-ए-इदराक से अपना मस्जूद

क़िब्ले को एहल-ए-नज़र क़िबला-नुमा कहते हैं

-ग़ालिब

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कवि-मित्र अदनान को उनकी ‘क़िबला’ कविता और उसपर भारत भूषण अग्रवाल सम्मान की घोषणा पर बधाई! आगे इस काव्य-यात्रा के लिए शुभकामनाएँ! मैं अपने समय की रचनाशीलता से वाकिफ़ हूँ, इसलिए विश्वास के साथ कह सकता हूँ कि अदनान कफ़ील दरवेश हिन्दी कविता में आकार ले रही नई पीढ़ी का सबसे संभावनाशील कवि है। इसका कारण शायद यह है कि अदनान हिन्दी विभागों में ट्रेंड न होकर, मात्र अपने आभ्यंतरिक वास्तव को समझने की कोशिश में, अभिव्यक्ति के नवीन रास्तों पर बढ़ गया है। यह सच्चाई है कि सृजन ऐसी यात्रा है, जिसका कोई पूर्व उपलब्ध नक़्शा नहीं होता। हमेशा एक बहुत अनजाना-सा उद्वेग ही इसका प्रणोदक होता है। अदनान न जाने किस दुनिया से घूमते, न जाने क्या-क्या देखते-सहते यहाँ तक पहुँचा है। उसके साथ उर्दू की एक अर्जित परंपरा, भोजपुरी की दुद्धा-गंध और जीवन की कोमल-कठोर सघन स्मृतियाँ हैं। इन स्मृतियों के अपने रंग, विचार का अपना ताप है और भावनाओं का अनूठा आवेग है। मैंने महसूस किया है कि उसके कवि-व्यक्तित्त्व में जीवन-मूल तक पहुँचने की एक अजब-सी छटपटाहट है और काव्य-वस्तु में इस सब को बहुत सहज ढंग से निर्वाह कर ले जाने की कूवत भी। मैं जानता हूँ, वह सामान्यतः बिंबों में सोचता है। अपने वय के हिसाब से उसे उर्दू भाषा और साहित्य का अच्छा ज्ञान है। लेकिन वह कविता में भाषा की चमकीली चप्पलों से सम्मोहित करना नहीं चाहता और न समास-गुम्फित वाक्य विन्यास या अरबी-फ़ारसी के घटाटोप से पंडिताई की धाक जमाना चाहता है।

उसके यहाँ हज़ार वर्षों में निर्मित दो क़ौमों की सांस्कृतिक घुलनशीलता का गाढ़ा रक्त है, जो उसने क़ौमी यकजहती के रस्मी मध्यवर्गी मुहावरों के बजाय, जीवंत प्रवहमान लोक से पाया है। उसकी कविताओं में न्याय की आदिम आकांक्षा है, जिसे उसने किसी संवेदनशील मनुष्य की तरह अर्जित किया है। उसकी कविताओं में अन्याय  के खिलाफ़ प्रतिरोध का अनुनाद है, जिसे उसने किसी विचार-व्यवस्था से नहीं, सौंदर्यबोध के एक पक्ष की तरह समझा है। इसके चलते ही शायद वह टीन के पत्तर-सी बजती हुई क्रांतिकारिता, न्यूज़ चैनलों-सी पेटपालू आक्रामकता और मध्यवर्गी बुद्धिजीवियों वाली अघाई अतिवादिता से बच गया है(काश आगे भी बचा रहे!) तो इसे स्वाभाविक ही समझना चाहिए। वह कभी भी जन-माध्यमों द्वारा आवेशित सामाजिक-राजनीतिक विमर्शों के भीतर से नहीं बोलता; इसके विपरीत संस्कृति, परंपरा, सामूहिक स्मृतियों और लोक-अनुभवों के भीतर से एक क्रिटिक रचते हुए सामने आता है। यह सब जो मैं कह रहा हूँ, इसे मनमाने की बात न समझ लिया जाए, इसलिए ज़्यादा अच्छा है कि हम ‘टेक्स्ट’ के बतौर उसकी पुरस्कृत कविता को सामने रखें। इससे हमारी बातचीत वस्तुनिष्ठ और प्रामाणिक हो सकेगी।

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अदनान की यह पुरस्कृत कविता स्त्री के घरेलू श्रम को विषय बनाती है। पढ़ते हुए एकबारगी यह भी लग सकता है कि इसके केंद्र में घरेलू श्रम नहीं, बल्कि निम्नवर्गीय मुस्लिम माँ है। यह ठीक है, बल्कि इसी दिशा से काव्यवस्तु में प्रवेश करना ज़्यादा ठीक है। लेकिन थोड़ा अवधानपूर्वक पढ़ना होगा, क्योंकि हम कविता में माँ के प्रति गलद्श्रु भावुक बोध खोजने के आदी हैं; जो इस कविता में नहीं मिलेगा, बल्कि उसके आगे, उसके दमन के कारणभूत संदर्भों तक उतरने का प्रयास है। माँ के प्रति भावुकता उसके आजीवन दमन और बहिष्करण को त्याग व आदर्श में बदल देता है। कहने का अर्थ यह है कि माँ के प्रति कृतज्ञता और आह्लाद से भरा हुआ हृदय भी उसके प्रति उसी दमन में शामिल हो सकता है। माँ के लिए लिखी गईं कविताएं सामान्यतः ऐसी ही हैं। लेकिन यह कविता माँ की ममतामयी, त्यागमयी दैवीय छवि रचने के बजाय, उसकी अवस्थितियों व दमन के विश्लेषण में उतरने की कोशिश है। ऐसी ही जगहों पर टी. एस. इलियट की वस्तुनिष्ठता और तटस्थता की समझ बहुत काम की लगती है। यहाँ कवि भावुकता में बहकर क्लिशे रचते हुए, बहुत कम में संतोष कर सकता था, लेकिन आलोच्य कविता प्रश्न करती है- ‘माँ के श्रम की क़ीमत कब मिलेगी आख़िर इस दुनिया में?’ यह प्रश्न ही अपने में गैर-रूमानी है। एक बारगी तो हमें समझ में ही नहीं आता कि माँ के श्रम की भी कोई क़ीमत हो सकती है ! फिर अन्दर से बुजुर्गियत से लदा जवाब उभरता है- भला माँ के अप्रतिम त्याग का भी कोई मूल्य हो सकता है? फिर मन में जवाब उगता है कि, माँ के त्याग का मूल्य हर पुरुष द्वारा उससे बड़ा त्याग हो सकता है ! फिर अनुभव गवाही देता है कि, इस सौंदर्यीकृत त्याग का मूल्य उसे दमन और बहिष्करण के रूप में ही मिलता है। फिर श्रद्धा और त्याग के सिद्धान्त के प्रति संदेह पैदा होना शुरू होता है और धीरे-धीरे हम इस निष्कर्ष की ओर बढ़ने लगते हैं कि शायद त्याग और श्रद्धा का यह सिद्धान्त स्त्री-श्रम के आर्थिक मूल्य को हड़पने का ही एक तरीका है! आख़िर माँ के श्रम की क़ीमत को हड़पता कौन है? और कैसे हड़पता है?

यह मान्य तथ्य है कि हमारी सामाजिक व्यवस्था का केन्द्र परिवार है। और स्त्री-जीवन का केन्द्र इस परिवार का रसोई घर ! इसे यहाँ नियोजित रखने के लिए पूरी आर्थिक व्यवस्था और मनो-सामाजिक निर्मिति काम करती है। परिवार स्त्री के दमन और शोषण का अड्डा है, हम इसे जानते भी हैं, परंतु मूलगामी प्रश्न उठाने से कन्नी काट जाते हैं। परिवार पर बात आते ही बड़े से बड़े क्रांतिकारी भी सुधारवादी हो जाते हैं और हकलाने लगते हैं। अपने को आधुनिक और समझदार मानने वाले मर्दों का प्रकाण्ड गुरु जॉन राल्स तक परिवार पर प्रश्न नहीं उठाता। उसके न्याय की सारी बातें परिवार से बाहर ही लागू होती हैं। वह परिवार को एकान्त, प्रेम, सद्भाव का प्रतीक कहता है और अपना सिद्धान्त सिर्फ़ पब्लिक स्फीयर पर लागू करता है। इस द्विभाजन के पीछे मर्दवादी भावबोध ही है। इस संस्था के ख़त्म होते ही न सिर्फ़ पुंसवाद अंतिम साँसें गिनने लगेगा, बल्कि पूंजीवाद भी।

बहुत सरल ढंग से इस बात को समझिए। पूंजीवाद जिस उत्पादक श्रम का उपयोग कर अपना सरप्लस बढ़ाता है, उस उत्पादक श्रम को पैदा करने वाली संस्था परिवार है, घर है। घरेलू श्रम वह है, जो पहली कमोडिटी उत्पादित करता है। यह उस श्रम को पैदा करता है, जिसका उपयोग करके पूँजीपति अपना पेटा चौड़ा करता है। यह घरेलू श्रम परिदृश्य से ओझल रहता है।  इसे बहुत शातिर ढंग से चिंता और परिदृश्य से बाहर रखा जाता है। यह श्रम पूर्णतः पूँजीपति की जेब में जाता है। इस श्रम को वह ख़रीदता तो है, पर उसके लिए एक भी पैसा नहीं देता। इसका कोई दाम नहीं कूता जाता। कोई मूल्य न कूते जाने के कारण स्त्री का पूरा घरेलू श्रम अनुत्पादक समझ लिया जाता है और सांस्कृतिक-आर्थिकी के भीतर इसका कोई मूल्य नहीं रहता। इसलिए अगर स्त्री दिनभर काम करती रहे तो भी पुरुष को यह नहीं लगता कि वह कोई काम भी करती है। अर्थात स्त्री-जीवन का बहुत बड़ा हिस्सा है, जिसे पुरुष समझ ही नहीं पाता, जो उसके अनुभवों में शामिल ही नहीं है। घर में दरवाजे के पीछे और आलमारी के ऊपर लगे हुए जाले, दूध बहने से करियाया हुआ चूल्हा, चाय-प्यालियों की तली में जमी हुई चाय, कड़ाही की कलौंछ, झूठ से बजबजाती हुई बाल्टी, लादी भर बच्चों के कपड़े, शीशों पर जमे तेल के निशान, हर रोज टूट जाने वाले बच्चों की शर्ट के बटन … और न जाने कितना कुछ। यह सब सार्वजनिक जीवन और भाषा के भीतर जगह ही नहीं बना पाता। इसलिए अगर किसी कविता में कवि इसे दर्ज़ करने की कोशिश करता है तो उसकी महत्ता को समझना चाहिए। उसे थोड़ा ठहरकर और संवेदनशीलता से पढ़ना चाहिए। इस विषय के आसपास हिन्दी में कुछ अच्छी कविताएँ हैं। हर कवि अपने काव्य-व्यक्तित्त्व के हिसाब से विषय के किन्हीं पक्षों को उदघाटित करता हुआ उसे काव्यवस्तु में बदलता है। यह समझने के लिए 9वें दशक के तीन कवियों की कविताएं विचार के लिए प्रस्तावित कर रहा हूँ। पहली कविता देवीप्रसाद मिश्र की है- ‘औरतें यहाँ नहीं रहतीं’। दूसरी कविता हरीश चन्द्र पाण्डेय की है- बैठक का कमरा। तीसरी कविता कुमार अंबुज की है- खाना बनाती स्त्रियाँ।

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देवीप्रसाद मिश्र की कविता बहुत मार्मिक ढंग से स्त्री और घर के सम्बन्धों को सामने रखती है। इस कविता में ढेर सारे संकेत हैं, जिसके सहारे हम परिवार की वर्तमान संरचना का तार-तार सुलझाते हुए उसकी ऐतिहासिक प्रक्रिया में उतर सकते हैं। इस कविता का फोकल प्वाइंट तो परिवार है पर उसकी अर्थ छवियाँ विस्तृत सामाजिक संरचना तक फैलती जाती हैं-

 

“औरतें यहाँ नहीं दिखतीं / वे आटे में पीस गई होंगी / या चटनी में पुदीने की तरह महक रही होंगी / वे तेल की तरह खौल रही होंगी / उनमें घर की सबसे जरूरी सब्ज़ी पक रही होगी / गृहस्थाश्रम की झाड़ू बनकर / अँधेरे कोने में खड़े होकर / वे घर नुमा स्थापत्य का मिट्टी होना देखती होंगी / सीलन और अँधेरे की अपठ्य पाण्डुलिपियाँ होकर / वे गल रही होंगी / वे कुएं में होंगी या धुएँ में होंगी / आवाज़ें नहीं कनबतियाँ होकर वे / फुसफुसा रही होंगी / तिलचट्टे सी कहीं घर में दुबकी होंगी वे / घर में ही होंगी / घर के चूहों की तरह वे / घर छोड़कर कहाँ भागेंगी वे / चाय पिएँ यह / उनकी ही बनाई है … ।

ऊपर उद्धृत देवीप्रसाद मिश्र की कविता का पहला वाक्य है- ‘औरतें यहाँ नहीं दिखतीं’।।  यहाँ नहीं दिखतीं !! यहाँ मतलब कहाँ ? कहाँ नहीं दिखतीं औरतें और वह कौन-सी जगह है जहाँ दिखती हैं? यह कविता इसी बात को खोलने का प्रयास है कि स्त्रियाँ कहाँ और कैसी दिखती हैं। तथा वहाँ और उस भूमिका में दिखना इस संरचना के लिए किस तरह आधार बनता है। यहाँ का मतलब केन्द्र से है, पहचान और अस्मिताओं की रंगभूमि, सत्ता और पब्लिक स्फेयर से है। वे यहाँ नहीं हैं, वे आटे में होंगी, वे चटनी में पुदीने की तरह महक रही होंगी। उनका यहाँ न होना ही इस “यहाँ” को इस तरह ‘यहाँ’ बनाए हुए है। वे यहाँ, इस रंगभूमि में होतीं तो इस संरचना में फर्क होता। इतने बड़े श्रम को अनुत्पादक श्रम कह दिया जाता है। यह कथित अनुत्पादक श्रम ही उत्पादक श्रम का आधार है। एक स्त्री के लिए परिवार क़ैद और बेगार का ठीहा है तो पुरुष के लिए अपने तनाव से मुक्ति का सुरक्षित ठिकाना। स्त्री का दायित्त्व पुरुष को ये सुविधाएँ उपलब्ध कराना है। यही उसकी सार्थकता है। इसीलिए वे वहाँ दिखती हैं और पुरुष यहाँ। वह रसोई में दिखती है और पुरुष बैठके में। हरीश चन्द्र पाण्डेय की कविता भी इसी ‘यहाँ’ और ‘वहाँ’ के संबंध को, परिवार और पब्लिक स्फेयर के संबंध को, रसोई और बैठके के संबंध को बहुत सहज ढंग से उद्घाटित करती है। इस पूरी कविता में देवीप्रसाद की कविता की तरह न तो स्त्रियों का कोई चित्र है, न स्त्रियों की अवस्थिति के प्रति वैसी तीव्र करुणा, फिर भी जो बात इस कविता को उल्लेखनीय बनाती है (जो देवीजी से छूट गयी थी) वह है- रसोई और बैठके का संबंध। वह है परिवार और पब्लिक स्फेयर का आर्थिक संबंध।

“खिला हुआ है कमल-सा बाहर का कमरा :

अपने भीतर के कमरों की क़ीमत पर ही खिलता है कोई

बैठक का कमरा

साफ़-सुथरा संभ्रांत”

भीतर के अथाह दमन को संभाले हुए ‘निष्प्राण मुस्कुराहट लिए बैठा रहेगा बाहर का कमरा’। बैठक का कमरा भीतर के कमरों के दम पर ही क़ायम रहता है। और उसे क़ायम रखने के लिए तरह-तरह की सांस्कृतिक रणनीतियों का विकास किया गया है। देवीप्रसाद मिश्र संकेत करते हैं कि स्त्रियों को शास्त्र और आश्रम व्यवस्था ने साधन की तरह रचा है। ये उसकी वास्तविक स्थिति के बारे में एकदम चुप हैं। पर वे अपने अनुभवों से घर नुमा स्थापत्य का मिट्टी होना समझती हैं। वे पपड़ी पर मौजूद रहने वाली किंचित हार्दिकता के पीछे मौजूद रहने वाले संबंध-सूत्रों को भी पहचानती हैं। पर कहीं भाग नहीं सकतीं। सबकुछ समझते हुए भी कुछ बदल न पाना त्रासद अनुभव है। वे घर के चूहे की तरह उसी घर में मरने के लिए अभिशप्त हैं। वे इस दमन को चेतन-अवचेतन में जमा करती जाएँ, पागल होती जाएँ पर कहीं भाग नहीं सकतीं! वे मज़बूर हैं इस आत्मनिरोधी संरचना में नियोजित रहने के लिए। यह है- सच्चा ‘एलियनेशन’। शताब्दियों से श्रम के शोषण से पैदा अ-लगाव। देवीप्रसाद मिश्र इस अ-लगाव और मज़बूरी को उद्घाटित करते हैं। उनका ध्यान घर के भीतर स्त्री की कारुणिक स्थिति पर है, जिसे वे प्रतीकों में रचते हुए आगे विचार के लिए संवेदनात्मक दिशा देते हैं। हरीश चन्द्र पाण्डेय उस कारुणिक स्थिति की आर्थिक संरचना को अपनी सहज-संवादधर्मी भाषा में उद्घाटित करते हैं। कुमार अंबुज की कविता इन कविताओं में सर्वाधिक लम्बी है। इसमें दैनंदिन जीवन-व्यवहार की महीन सांस्कृतिक-राजनीति को खोलने का प्रयास है। परंतु यह न तो देवीप्रसाद जैसी करुणा पैदा कर पाती है और न ही उसकी अवस्थिति के कारणभूत संदर्भों को, हरीश चंद पाण्डेय की तरह, खोल पाती है। बल्कि पूरी कविता फूल, बुलबुल, हिरणी, डाली, आसमान के बावजूद, अंततः अपनी संवेदनात्मक दिशा में स्त्री के लिए पुरुष के तवज्जो की माँग लगने लगती है। लेकिन हम यह देख आये हैं कि तवज्जो पा जाने से उसकी समस्याओं का समाधान नहीं होगा। जिस चीज़ का कोई आर्थिक मूल्य न हो उसका सांस्कृतिक मूल्य भी नहीं होता।

[4]

ध्यातव्य है कि अदनान के भाव-बोध का केन्द्र मुस्लिम समाज की निम्न वर्गीय जीवन-स्थितियाँ हैं; ठीक असद जैदी की शुरुआती कविताओं की तरह। इस संदर्भ में असद की ‘बहनें’ शीर्षक कविता याद कर सकते हैं, लेकिन इस कविता की ताक़त और सीमाएँ वही हैं जो ऊपर उद्धृत देवीप्रसाद मिश्र की छोटी-सी कविता की। दोनों कविताएँ करुणाविगलित तो करती हैं, लेकिन कारणभूत संरचना का कोई संकेत नहीं देतीं। हरीश चंद्र पाण्डेय और अदनान की ‘क़िबला’ कविता में स्त्री के हकमारी के कारणभूत संदर्भों का संकेत है। अदनान की यह कविता माँ के प्रति भाव-विगलित होने के बजाय स्त्री के दमन में धर्म की भूमिका को खोलती है। आप ध्यान दें तो कविता की शुरुआत इसी के पहचान के साथ होती है – “नमाज़ पढ़ने औरतें मस्जिद नहीं जाया करतीं हमारे यहाँ/ क्यूँकि मस्जिद ख़ुदा का घर है और सिर्फ़ मर्दों की इबादतगाह।” कविता की इन शुरुआती दो पंक्तियों में मार्मिक व्यंग्य है। स्त्री और पुरुषों के मस्जिद जाने न जाने और ख़ुदा का घर होने में कार्य-कारण संबंध है। मस्जिद ख़ुदा का घर है, इसलिए औरतें नहीं जातीं। वह ख़ुदा का घर है, इसलिए नमाज़ पढ़ने सिर्फ़ पुरुष जा सकते हैं। अर्थात जहाँ ख़ुदा है, वहाँ स्त्री के लिए जगह नहीं हो सकती। और बहुत सांकेतिक ढंग से ख़ुदा को एक मर्द ही कहा जा रहा है। और प्रश्न के शिल्प में कहा जा रहा है कि मेरी माँ का ख़ुदा निर्दयी है।

अदनान की कविता में पहली बार घरेलू श्रम के शोषण के आर्थिक विश्लेषण के साथ उसका सांस्कृतिक और धार्मिक पक्ष भी खुलता है। इसे पढ़ते हुए परिवार और पब्लिक स्फेयर के द्विभाजन के पीछे की सांस्कृतिक आर्थिकी खुलने लगती है। बाज़ार में शोषण है, फिर भी वहाँ कार्य की कुछ शर्तें हैं। वहाँ समय और छुट्टियाँ निश्चित हैं। परंतु घर वह पवित्र(!) जगह है जहाँ कोई श्रम क़ानून लागू नहीं होता। यह ‘लाइफ लांग’ बेगार है –

“रोज़ देखा है मैंने माँ को

पौ फटने के बाद से ही देर रात तक

उस अँधेरे-करियाये रसोईघर में काम करते हुए

सब कुछ करीने से सईंतते-सम्हारते-लीपते-बुहारते हुए

जहाँ उजाला भी जाने से ख़ासा कतराता था

माँ का रोज़ रसोईघर में काम करना

ठीक वैसा ही था जैसे सूरज का रोज़ निकलना

शायद किसी दिन थका-माँदा सूरज न भी निकलता

फिर भी माँ रसोईघर में सुबह-सुबह ही हाज़िरी लगाती.

रोज़ धुएँ के बीच अँगीठी-सी दिन-रात जलती थी माँ

जिसपर पकती थीं गरम रोटियाँ और हमें निवाला नसीब होता”

चौबीस घण्टे, और बिना किसी ‘वीकेण्ड’ के सातों दिन का बेगार, सिर्फ दैहिक हिंसा से नहीं चल सकता। इसके लिए उस स्त्री की भी सहमति चाहिए। धर्म स्त्री से यही सहमति अर्जित करने का काम करता है। स्त्री के पूरे जीवन को घर के भीतर आत्म-बहिष्कृत करके क़ैद कर देने के इस दुष्चक्र में धर्म सबसे मज़बूत सहयोगी है। धर्म ही उसके पूरे श्रम के आर्थिक मूल्य के बजाय नैतिक मूल्य में बदलकर अनुत्पादक श्रम बना देता है। इसलिए पूरी कविता में धर्म के मुखालिफ़त की सघन अनुगूँज सुनाई पड़ती है। बल्कि पूरी कविता में माँ के दमन सघनता के साथ मुखालिफ़त के तीखेपन में भी विकास होता है। हम देख आए हैं कि शुरुआती पंक्तियों में मस्जिद से स्त्री के बहिष्करण पर उसे “ख़ुदा का घर है और सिर्फ़ मर्दों की इबादतगाह” कहा गया है! उसके बाद सिजदे को सिर पटकना कहा जाता है- माँ ‘दिन में पाँच बार सिर पटकती ख़ुदा के सामने’! और अंत तक पहुँचते न-पहुँचते प्रश्न पूछता है कि -‘मेरी माँ का ख़ुदा इतना निर्दयी क्यों है ?’ यह प्रश्न बाहर से थोपा गया नहीं है, बल्कि काव्यवस्तु के संवेदनात्मक अंतर्सूत्रों की सहज परिणति है। इसी तरह काव्यवस्तु में व्यंजना के स्तर पर धर्म और स्त्री-श्रम के शोषण की संबद्धता का सूत्र विकसित होते हुए सीधे प्रश्न के रूप में सामने आता है- “माँ के श्रम की क़ीमत कब मिलेगी आख़िर इस दुनिया में?” इस बेगार में उसकी जो उम्र कटी है, क्या उसे वापस किया जा सकता है? क्या उसके स्वप्न उसे लौटाए जा सकते हैं, जो उससे छीन लिए गये?

सामान्यतः हम इस तरह नहीं सोचते, हमारा ध्यान ही नहीं जाता इन प्रश्नों पर। धर्म इन असुविधाजनक प्रश्नों से बचने के लिए त्याग और स्त्रीधर्म का दुष्चक्र रचता है। सिर्फ यही नहीं बल्कि स्त्री-जीवन पर भाव-विगलित कविताएं भी अनजाने रूप से इसी दुष्चक्र में शामिल होती हैं। तो इस तरह पूरा एक मनो-सामाजिक संदर्भ तैयार होता है जो हमारे भाव-बोध को इन असुविधाजनक प्रश्नों से बचाता है। कारण कि पुरुषसत्ता की सुविधाएँ, इतने बड़े हिस्से के दमन और शोषण का ही प्रतिफल हैं। हम इस दमन और शोषण को देखते-जानते हुए भी क्या इन सुविधाओं को छोड़ने के लिए तैयार हैं? शायद नहीं! यह कविता हमें एक त्रासद अनुभव की तरफ़ ले जाती है और हमें अपनी सांस्कृतिक निर्मितियों से टकराने की ज़रूरत पड़ती है। कई बार दमन हमारे चेतन-अवचेतन, सुख, स्वप्न, डर में जीवन की सामान्य लय की तरह शामिल रहता है। यह हमारे जीवन-व्यवहार में इस कदर सहज स्वीकृत है कि अलक्षित रहकर गतिशील बना रह सके। लेकिन कविताएँ अपने रास्ते पर बढ़ती हुई भी बहुत कुछ अकथ और अजानी दिशाओं की तरफ़ चली जाती हैं और तमाम दार्शनिक गहराइयों के साथ दमन की महीन परतों को उघाड़ जाती हैं।

 

 

 

 

 

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