विज्ञप्ति : पक्षधर – रजत जयंती अंक

आदिवासी अध्याय क्या होगा ? बगैर आदिवासी समाज की सांस्कृतिक विशिष्टता को उजागर किये क्या भारतीय समाज की सामासिकता पूर्ण होगी ? आदिवासी समाज का अध्ययन करते समय ऐसे बहुतेरे सवाल खड़े होंगे क्योंकि आदिवासी समाज की अपनी अलग समानांतर दुनिया रही है, जो ‘श्रम के शोषण’ के बजाय ‘श्रम की सामूहिकता’ के जीवन-दर्शन के साथ चलती रही है । इस तरह सहजीविता उनके जीवन का मूल दर्शन बना । समाज के नागरिकों के साथ सहजीविता और समाज में मौजूद प्रकृति के साथ सहजीविता । यह दर्शन परा-भौतिकतावादी नहीं बल्कि भौतिकतावादी दर्शन है । यह जीव, आत्मा, परमात्मा और परलोक पर विचार करने के बजाय अपनी धरती और प्रकृति का संवादी है । आदिवासियों की समाज व्यवस्था, सामाजिक संस्थाएँ और अर्थतंत्र इसी विचार पर आधारित रहे हैं और हैं । अमेरिका के रेड इंडियंस से लेकर भारत के आदिवासी समुदायों की जीवन शैली, उनकी गाथाएँ, गीतों और कथाओं में ये सारे विचार मौजूद हैं । मशहूर लेखक एडुवार्डो गलियानो कहते हैं कि दुनिया को मौजूदा संकट से बचाने का एक रास्ता है जो आदिवासियों की तरफ जाता है । यह महज रूमानियत नहीं है | जब हम कथित सभ्यता के वर्चस्वकारी अहं और भ्रम से बाहर निकल कर देखेंगे तो इतिहास और वर्तमान में उदाहरणों की लम्बी फेहरिस्त मिलेगी ।

पिछले एक-दो दशकों से हिंदी साहित्य में आदिवासी समाज की बात ‘विमर्श’ की तरह कही जा रही है । यहाँ सब अपने-अपने अनुमान से विमर्श किए जा रहे हैं, पर देखा जाय तो आमतौर पर विकास और विस्थापन के सवाल ही विमर्श में उठ रहे हैं | जबकि, गौरतलब यह है कि आदिवासी समाजों की अपनी-अपनी भाषाएँ हैं जो हिंदीतर हैं । यह पूर्वोत्तर से लेकर मध्य, पश्चिम और दक्षिणतक फैली हुई हैं । उनमें न केवल विपुल साहित्य मौजूद है बल्कि उनका मौलिक चिंतन भी वहाँ मौजूद है । उनसे जुड़े बिना, संवाद किए बिना क्या यह विमर्श पूरा होगा ? आज विमर्श की बात करते हुए बात केवल आर्थिक प्रश्नों तक सिमट रही है । मसलन,  कहा जाता है कि आदिवासी समाज पिछड़ा और आर्थिक रूप से कंगाल है ।  दरअसल, यह अधूरा विचार है जो न केवल श्रेष्ठता बोध से ग्रसित है बल्कि उस औपनिवेशिक नजरिए और मानसिकता का भी द्योतक है जिसकी नजर में प्राकृतिक संसाधन तो सोने की खान हैं पर वहाँ के लोग उजड्ड और गंवार । इसलिए, कोई भी आर्थिक संरचना अपने विकास के वैश्विक ढाँचे और दबाव में तब तक केवल जल, जंगल और जमीन की लूट का ही तंत्र सिद्ध होगी जब तक वहाँ के समुदायों, उनकी सांस्कृतिक पहचान और उनके प्राकृतिक सहजीवन को उस विकास की नीतियों में महत्व न दिया जाय ।

हम ‘पक्षधर’ पत्रिका की ओर से आदिवासी समाज की इन्हीं चिंताओं पर विशेष अंक प्रस्तावित कर रहे हैं । यह अंक पत्रिका का ‘रजत जयंती अंक’ (25 वां अंक) है । आदिवासी समाज, विकास के सवाल और सामासिकता की राष्ट्रवादी राजनीति’ इस विशेषांक का केंद्रीय विषय होगा । यह महाविशेषांक चार हिस्सों में नियोजित है :

 

पहला भाग :

पूर्व कथन

इसके अंतर्गत आदिवासी अस्मिता की जड़ों की तलाश होगी । इसमें निम्नलिखित संभावित शीर्षकों के अंतर्गत वैचारिक/शोध लेख होंगे :

  1. इतिहास और मिथक
  2. विचार/दर्शन
  3. समाज-व्यवस्था/सामाजिक संस्थाएँ
  4. भाषिक और सांस्कृतिक रहन
  5. आदिवासी समाज का वैश्विक संदर्भ

उत्तर कथन

यह हिस्सा आजादी के बाद की स्थितियों, मूलतः विकास और विस्थापन के सवाल पर आधारित होगा । इसमें निम्नलिखित संभावित शीर्षकों के अंतर्गत लेख होंगे :

  1. भारतीय लोकतंत्र और आदिवासी समाज
  2. संविधान निर्माण की प्रक्रिया और आदिवासी पक्ष (जयपाल सिंह मुण्डा)
  3. विकास और विस्थापन का सवाल : पूर्व औपनिवेशिक, औपनिवेशिकक और उत्तर औपनिवेशिक
  4. भूमंडलीकरण, बाजार और आदिवासी समाज
  5. सिनेमा और आदिवासी समाज

 

दूसरा भाग :  

रचना एवं आलोचना

इसके अंतर्गत आदिवासी जीवन पर आधारित रचनाएँ एवं उनकी आलोचना शामिल की जाएंगी ।

 

तीसरा भाग :

सहियापा                       

यह अनुवाद वाला भाग होगा । इसमें आदिवासी मातृभाषाओं में मौजूद उल्लेखनीय रचनाओं का हिंदी अनुवाद प्रस्तुत किया जाएगा ।

 

चौथा भाग :

साक्षात्कार

यह साक्षात्कारों वाला खंड होगा । इसमें आदिवासी अस्मिता और पहचान को बचाने और तथाकथित विकास से उत्पन्न विस्थापन के विरोध में आन्दोलनरत  सामाजिक नेतृत्वकर्ताओं और  साहित्यकारों का साक्षात्कार होगा । आप सबसे निवेदन है कि उपर्युक्त विषयों को ध्यान में रखते हुए लेख, अनुवाद, साक्षात्कार, कविता, कहानी, संस्मरण, रिपोर्ताज़ 15 मार्च 2019 तक निम्नलिखित पते पर भेज कर इस महत्वपूर्ण आयोजन में हमारा सहयोग करें । प्रकाशन हेतु लेख/रचनाओं के चयन पर अंतिम निर्णय ‘पक्षधर’ की संपादकीय टीम का होगा ।

भवदीय

अनुज लुगुन

पता/मेल :

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Editor : Pakshdhar, C-4/604 Olive County, Sector-5, Vasundhara, Ghaziabad-201012

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