हादसों के बीच भरोसे की गवाही: दरवेश की कविताएँ

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हादसों के बीच भरोसे की गवाही: दरवेश की कविताएँ

आशुतोष कुमार

‘सन् १९९२’ अदनान कफील दरवेश की २०१७ में लिखी कविता है. १९९२ बाबरी मस्जिद की शहादत का साल है. अयोध्या में हुए इस विध्वंस के इर्द-गिर्द हिन्दी में बहुत–सी कविताएं लिखी गईं है. इनमें से कुछ बहुत प्रसिद्ध भी है. जैसे ‘सामान की तलाश’ में संकलित असद ज़ैदी की कुछ कविताएँ. ख़ास तौर पर ‘हलफ़नामा’ और ‘कौन नहीं जानता’. ‘अयोध्या,१९९२’ कुंअरनारायण की कविता है. विध्वंस के एक साल पहले ही अनिल कुमार सिंह की कविता ‘अयोध्या, १९९१’ चर्चित और सम्मानित हो चुकी थी. ‘अयोध्या’ शीर्षक से निर्मला गर्ग की भी एक अच्छी कविता है. सवाल है अयोध्या के इर्द-गिर्द लिखी गयी इतनी सारी अच्छी कविताओं के बावजूद अदनान कविता इतनी ताज़ा और अलग क्यों लगती है!

कुंअर नारायण और निर्मला गर्ग की कवितायेँ अयोध्या आन्दोलन को मर्यादा पुरुषोत्तम राम की मर्यादा और उत्पीड़ितों के प्रति उनकी करुणा के अतिक्रमण के रूप दर्ज करती हैं. इन कविताओं में मानवीय विडम्बना का स्वर प्राथमिक है, राजनीतिक नहीं. .

अनिल की कविता में एक ज़िंदा शहर को ‘चालू राजनीति के गर्भपात’ में बदलने के षड्यंत्र के खिलाफ अयोध्यावासियों का प्रतिवाद था. शहर को एक राजनीतिक प्रतीक में बदल देना उस प्रक्रिया का हिस्सा था, जिसकी परिणति ऐतिहासिक मस्जिद के विध्वंस में होनी थी.

अयोध्या आन्दोलन प्रतीकों की राजनीति का अद्भुत उदाहरण था. ठंढे बस्ते में पड़े हुए एक स्थानीय विवाद को राष्ट्रीय स्तर पर इस तरह पुनर्जीवित किया गया कि बाबरी मस्जिद मुसलमानों द्वारा हिन्दुओं पर किए गए कथित ऐतिहासिक अत्याचार का प्रतीक बन गई. एक ऐतिहासिक मस्जिद ‘विवादास्पद ढांचा’ बन कर रह गई. अयोध्या, जो हिन्दुओं का प्रमुख तीर्थ भी न था, अचानक हिन्दुओं का मक्का हो गया. यों मस्जिद का विध्वंस हिंदू अस्मिता की पुनर्स्थापना और मुस्लिम अस्मिता के विध्वंस का प्रतीक बन गया. असद ज़ैदी की कवितायेँ प्रतीकों के जरिए रचे गए इस समूचे सांस्कृतिक-सामाजिक विध्वंस को, और उसकी त्रासदी को, सम्बोधित करती हैं.

अदनान की कविता में असद जैदी की कविता की अनुगूंज साफ़ सुनाई देती है. उसकी कविता दरअसल इस अनुगूंज से शुरू होती है. यह उसकी कविता का प्रस्थान विन्दु है. लेकिन इसके आगे की यात्रा उसकी अपनी है .

पहले असद की कविता ‘कौन नहीं जानता’ पढ़िए.

“कौन नहीं जानता/ अयोध्या में सभी कुछ / काल्पनिक है

वह मस्जिद/ जिसे ढहाया गया/ काल्पनिक थी

वे तस्वीरें/ किसी मशहूर फ़िल्म/ के लिए थीं

यह एक दोपहर की झपकी थी/ एक अस्तव्यस्त सा/ स्वप्न था/ या किसी का खर्राटा

जिसकी आवाज़ के परदे में मेहराब के चटकने की

ख़फ़ीफ़  सी आवाज़ घुल गयी

कुछ गुम्बदें धीमी गति से गिरती चली गयीं

काले-सफ़ेद धुंधलके में”

अब अदनान की कविता ‘१९९२’ की अंतिम पंक्तियाँ देखिए.

‘मेरे मुल्क़ के रहबरों और ज़िंदा बाशिंदों बतलाओ मुझे
कि वो क्या चीज़ है जो इस मुल्क़ के हर मुसलमान के भीतर
एक ख़फ़ीफ़ आवाज़ में न जाने कितने बरसों से
मुसलसल गिर रही है
जिसके ध्वंस की आवाज़ अब सिर्फ़ स्वप्न में ही सुनाई देती है!’

कविता हमारे समकाल की सबसे त्रासद विडम्बना को दर्ज करने और विषाद प्रकट करने से से आगे जाती है. वह अपने पाठकों के सामने एक सीधा सवाल रखती है. वह क्या चीज है जो हर मुसलमान के भीतर मुसलसल गिर रही है.वह सिर्फ़ सुरक्षा-बोध, नागरिकता का गर्व, अपने वतन के साथ आत्मीयता का उसका भाव ही नहीं है. यह मुसलसल गिरने वाली चीज शायद यह एक ऐसा ‘भरोसा’ है, जिस पर इंसान के रूप में उसका ‘होना’ दूर तक निर्भर करता है. पाठक इस सवाल का सामना करते हुए महसूस करता है कि इसका कोई आसान जवाब नहीं है.

अदनान की कविता विध्वंस के एक क्षण का विस्तार विध्वंस की उस निरंतर प्रक्रिया में करती है, जो तब से आज तक जारी है. यह कविता असद की कविता में निहित राजनीतिक व्यंग्य के त्रासद ऐतिहासिक निहितार्थों की खोज करती है. अयोध्या में उस दिन सिर्फ़ कुछ गुम्बदें नहीं गिरीं, एक सम्पूर्ण सभ्यता का, एक ऐतिहासिक स्मृति का, पतन हुआ. विध्वंस सिर्फ़  लोकतंत्र और धर्मनिरपेक्षता के संवैधानिक मूल्यों का ही नहीं हुआ, भारत की उस अस्मिता का भी हुआ, जिसे हिंदुस्तानियत या गंगा-जमुनी तहजीब कहते हैं. इसने सहसा देश की आबादी के बहुत बड़े अल्पसंख्यक  हिस्से को तो दूसरे दर्जे की नागरिकता में ढकेल दिया. लेकिन आबादी के बाकी हिस्से को भी साथ ही दूसरे दर्जे की मनुष्यता में घसीट लिया गया.

 

 

भारत में मुगल हुकूमत आम तौर पर हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच सौजन्य, सहयोग और सहभागिता का समय था. इसी सहभागिता से उस सांझी संस्कृति का विकास हुआ, जिसे गंगा-जमुनी तहजीब कह कर पुकारा जाता है. मुग़ल साम्राज्य की राजनीतिक, सैनिक, आर्थिक और सांस्कृतिक समृद्धि में ‘सुलह कुल’ की नीति पर आधारित इस सौजन्य की मुख्य भूमिका थी. यह सच है कि औरंगजेब के शासनकाल में शासकीय नीति के बतौर ‘इस्लाम’ पर जोर दिया गया. लेकिन लोक–स्मृति में इस दौर को  ‘विचलन’ के रूप में दर्ज किया गया. औरंगजेब के बाद भी हिन्दुओं और मुसलमानों की एकता बनी रही. यह एकता १८५७ में अंग्रेजों के खिलाफ़ हुए हिन्दुओं-मुसलमानों के महान विद्रोह में क्रांतिकारी ऊर्जा बन कर प्रकट हुई.

हिन्दुओं पर मुसलमानों के अत्याचार की ‘कहानियां’ मुख्य रूप से अँगरेज़ इतिहासकारों की देन थीं. अंग्रेज़ी राज के दौरान अयोध्या में जन्मभूमि विवाद को हवा देने में भी कुछ अँगरेज़ अधिकारियों की भूमिका बताई जाती है. अयोध्या आन्दोलन ने इन्ही आरोपित कहानियों को अपना उपजीव्य बनाया. इस आन्दोलन के जरिए सामाजिक न्याय के उठते हुए ज्वार के सामने ‘’हिंदू’ एकजुटता कायम करने के लिए ‘मुसलमानों’ को ‘हिन्दुओं’ के ऐतिहासिक शत्रु के रूप में लोक-स्मृति में दुबारा प्रक्षेपित किया गया. पहली बार अंग्रेजों के भ्रामक इतिहास-लेखन के जरिए ऐसा किया गया. दूसरी बार संघ-परिवार के काल्पनिक इतिहास लेखन के जरिए. यों इतिहास को बदल कर एक समावेशी समाज को कट्टर असहिष्णु साम्प्रदायिक समाज में बदलने की कोशिश की गयी.

अदनान की कविता ’१९९२’ भारतीय सभ्यता के इस महा-पतन को बहुत-सी सुपरिचत साधारण चीजों के गिरने के रूपक के जरिए व्यक्त गिरती है. गुम्बदों के गिरने के साथ हाजी हशमतुल्ला की टोपी गिरती है तो सकीना का  अजन्मा बच्चा भी गिरता है. रामनामी और खड़ाऊं गिरते हैं तो बच्चों के खिलौने और पतंगे भी गिरती हैं. लेकिन इस कविता की असली ताक़त उस इंसानी भरोसे में है, जो अभी भी नष्ट नहीं हुआ है. चौतरफा हादसों के बावजूद उम्मीद की एक किरण, चाहे वो कितनी ही क्षीण और अलक्षित हो, अदनान के कविता में हमेशा जीवित रहती है.

यही भरोसा है, जो अदनान की कविता को उद्भ्रांत विलाप, विक्षिप्ति, शून्य अन्धकार,  बर्बर व्यंग्य,  और चरम निराशा से बचा ले जाती है, जो उनकी पीढी के बहुत से युवा कवियों में प्रचुरता से मिलती है. यह वही भरोसा है, जो अदनान की कविता का अंत एक परम वक्तव्य में नहीं होने देता. वह अक्सर  अपने पाठकों के सामने एक सवाल या सम्वाद की एक कोशिश के रूप में खुला रहता है.

इस भरोसे के कारण ही हादसों की बरसात के बीचोबीच बदलाव की हिम्मत और कविता की सम्भावना बची रहती है –

‘आज रात भर होगी बारिश

और मेरी स्मृति में कोई छप्परनुमा मकान टपकेगा

टप्-टप्-टप्

हम मुक्कियों में ईंट के टुकड़े भरेंगे

और खिड़कियों पर पीली पन्नियाँ कस-कस के बाँधेंगे

बारिश का पानी हमें रात भर भयभीत करेगा

बिजली की कड़कती आवाज़ से हम रात भर काँपेंगे

और उकडूं बैठे रहेंगे

इस तरह ठिठुरते और सिकुड़ते हुए पूरी रात कटेगी

और हम सोचेंगे कि अगली बरसात तक

इस कमरे को

किस तरह रहने लायक बना दें…’

यह इंसानी भरोसा गमछा, अपने गाँव को याद करते हुए, पुन्नी मिस्त्री, बाबूलाल चौकीदार, मेरी दुनिया के तमाम बच्चे और घर जैसी अनेक कविताओं में हादसों के भायवह रोजनामचों को सहसा एक मानवीय उजास से भर देता है. यह उजास बाहर से कविता के हाथ में जबरन थमाए गए किसी बौद्धिक आशावाद से नहीं आती. अदनान के यहाँ यह गहन इंसानी भरोसा ही कविता का उत्स है.

यह भरोसा ही है जो उसे हादसों का सच्चा भरोसेमंद गवाह बनाती है. जिन कवियों के हाथ से यह भरोसा छूट गया है, उनसे उनके जाने-अनजाने हादसों का सामना करने की सलाहियत भी छूट रही है. यह भरोसा ही है जो अदनान को अपने समय की भीषणतम दुर्घटनाओं को खुली आँखों से देखने और दर्ज करने की हिम्मत देता है. इसी हिम्मत से ‘गाएं’ जैसा समकाल का विलक्षण व्यंग्यचित्र रचा जाता है.

इस भरोसे की जड़ें उस निम्नमध्यवर्गीय मेहनतकश जीवन में हैं, जो अदनान की कविता का सामाजिक आधार है. गांवों और कस्बों में हर सांस के लिए संघर्ष करता साधारण जन हर जगह अदनान की कविता का मूक नायक है. वह साधारण जन जो केवल संघर्ष ही नहीं करता, प्रेम भी डूब कर करता है. वह केवल सामाजिक यातनाओं का ही नहीं प्रेम की यंत्रणा का गवाह भी है. वह यह जानते हुए भी प्रेम करता है कि-

‘…….अब सिर्फ़ जगह बची है

प्रेम नहीं

अब प्रेम उस जगह के खाली होने

और भरने के बीच का एकांत है.’

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