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प्रतिरोध की संस्कृति का रचनात्मक हस्तक्षेप

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संपादकीय-39

विनोद कुमार शुक्ल

(मनुष्य होने के अकलेपन में बहुत चुप बहुत धीरे चला)

- विनोद तिवारी

ब्रिटिश दार्शनिक, निबंधकार और योरोपियन रेनेसाँ के एक महत्वपूर्ण किरदार फ्रांसिस बेकन का एक निबंध याद आ रहा है 'ऑफ स्टडीज़' । इस निबंध में एक महत्वपूर्ण कथन है: Reading maketh a full man, conference a ready man and writing an exact man. विनोद कुमार शुक्ल (1937-2025) इसमें तीसरी कोटि के व्यक्ति थे । उन्होंने लिखने के अलावा और कुछ नहीं किया । और आज जब वे हमारे बीच नहीं हैं तो हम देख पा रहे हैं कि अपने लेखन के बल पर वह साहित्य के विपुल संसार में, हमारे बीच जीवित बचे रहेंगे । उनकी एक प्रसिद्ध कविता (जिसकी आख़िरी दो पंक्तियों को शीर्षक बनाकर, अचल मिश्रा ने उन पर एक बहुत सुंदर डाक्यूमेंट्री बनाई है) की कुछ पंक्तियाँ याद आ रही हैं : किसी होने वाले युद्ध से जीवित बच निकलकर मैं अपनी अहमियत से मरना चाहता हूँ कि मरने के आख़िरी क्षणों तक अनंतकाल जीने की कामना करूँ कि चार फूल हैं और दुनिया है । अपनी अहमियत के साथ, अनंतकाल तक जीने की कवि की इच्छा, उसके न होने पर, अब उसके रचना कर्म की अहमियत से पूरी होती दिख रही है । मीडिया, सोशल मीडिया पर उनको चाहने वाले, पसंद करने वाले लोगों ने उन्हें जिस शिद्दत के साथ याद किया है, उससे एक लेखक की अपने पाठकों के बीच उपस्थिति और ज़िंदा होने का अंदाज़ा लगाया जा सकता है ।

साहित्य-जगत में विनोद कुमार शुक्ल की छाप विशिष्ट और अनुपम है । उनका लेखन हर उस शोर के विपरीत है जो तरह-तरह के वादों, सिद्धांतों, बहसों, विमर्शों, आदि से लदी-फँदी है । उनकी कविता तरह-तरह के समकालीन नारों और विज्ञापनों के शोर-तमाशे से भी दूर है । इस मानी में अपनी राह के वे अकेले साधक हैं, चुपचाप आहिस्ता-आहिस्ता चलते चले जाने का सहज विश्वास – जाते- जाते ही मिलेंगे लोग उधर के / जाते-जाते छूटता रहेगा पीछे / जाते-जाते बचा रहेगा आगे । ऐसे में, ऊपरी तौर पर यदि कहना हो तो कहा जा सकता है कि उनकी कविताएं वर्तमान से विच्छिन्न कविताएँ हैं । वर्तमान में मौजूद राजनीतिक-सामाजिक समस्याओं को वह अपनी कविता का विषय नहीं बनाते । यह सच भी है । लेकिन, उनकी कविताओं के पाठक यह जानते हैं कि उनकी कविताएं अपनी अंतर्वस्तु में अपने समय से बाहर की कविताएं नहीं हैं । प्रकृति, प्रेम, पर्यावरण, पृथ्वी, घर, परिवार, मानाधिकार, मूल्य-चिंता, नष्ट होते हुए को बचा लेने की चिंता, क्या समकालीन प्रश्न नहीं हैं ? अगर हैं तो उनकी कविताएँ अपनी अंतर्वस्तु (कंटेंट) में समकालीन हैं, हाँ उनको रचने-बरतने का उनका भाव अलग है । अनुभूति का विशिष्ट भाषिक रूपान्तरण, उनके साहित्य को अलहदा बनाता है । ध्यातव्य है कि यह 'अनुभूति' किसी आध्यात्मिकता में निष्पन्न होने वाली अनुभूति नहीं हैं । उनके यहाँ जीवन, जगत और लोग ही महत्व पाते हैं । विनोद कुमार शुक्ल की कविताओं और उपन्यासों में संरचित जीवन-जगत भले ही प्रत्यक्ष-यथार्थ नहीं प्रतीत होता हो, पर उसमें जो अदृश्य जीवन है, वह स्वप्न नहीं यथार्थ के अनेक स्तरों वाला जीवन है । यही उनकी साहित्य-संवेदना और भाषा की उपलब्धि है । अपनी इसी भाषा-संवेदना के नाते वे हिन्दी के साहित्य जगत में अलग से पहचाने जाने वाले कवि कथाकार हैं । वे जब यह कहते हैं कि 'उपन्यास लिखते समय मैं आसानी से कविता लिख पाता हूँ । उपन्यास लिखना उपन्यास के साथ-साथ कविता लिखना भी है' तो वे उस चमकीले, मोहक और दर्दनाक जीवन को, उसकी समग्रता में पकड़ने, जीने और व्यक्त करने की सृजनात्मक क्षमता को ही सामने रखने और उसे चिन्हवाने की इच्छा रखते हैं । समकालीनता का अर्थ समसामयिक होना ही नहीं होता बल्कि मानव सभ्यता में कुछ शाश्वत प्रवृत्तियाँ और सवाल भी होते हैं, जो सदियों से बने हुए हैं । विनोद कुमार शुक्ल सभ्यता के विकास क्रम में उन शाश्वत प्रवृत्तियों और सवालों को तलाशने और रचने वाले कवि हैं । ऐसे में अगर यह कहना कि वह

समकालीन प्रश्नों से बचकर एक अलग लोक में रमें कवि हैं, उचित नहीं । उनकी एक कविता है 'मैं अदना आदमी' उसमें एक पंक्ति आती है – बाहर को कोई खटखटाता है । विनोद कुमार शुक्ल अपने लेखन में 'बाहर' को हमेशा बाहर रखने की युक्ति तलाशते रहते हैं । उनके एक कम चर्चित किन्तु महत्वपूर्ण उपन्यास 'खिलेगा तो देखेंगे' के नायक गुरु जी प्राकृतिक आपदा के चलते, प्राथमिक पाठशाला के अपने घर के उजड़ जाने के बाद, पूरे परिवार समेत खाली और निष्क्रिय, किन्तु अपने होने के प्रभाव में अब भी मौजूद पुलिस थाना को ही अपना घर बना लेते हैं । थाने में क़ैदियों को बंद कर रखने वाली ज़ेल-कोठरी को वे अपन कमरा बनाना चाहते हैं, किन्तु पाते हैं कि इस कोठरी को तो अंदर से बंद किया ही नहीं जा सकता, इसे केवल बाहर से ही बंद किया जा सकता है । बहुत सोचने के बाद इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि क्यों न इस कोठरी को, सलाखों से हाथ निकाल कर बाहर से ही बंद कर दिया जाये और इस तरह से बाहर को बाहर से ही बंद कर दिया जाए । और अंदर से बाहर का ताला लगाकर, खुद को उस कोठरी में बंद कर लेते हैं । इस रूपक को समझने के लिए स्वतन्त्रता का मूल्य और मतलब समझना होगा । वह बाहर को अछोर मानते हैं, इसलिए, उसे मापने का कोई भी एक मापक, उसके अंतिम छोर तक पहुँचने की कोई भी एक दृष्टि उन्हें स्वीकार्य नहीं । संभवतः वे इस बात में विश्वास करते हैं कि बाहर की यात्रा में भागदौड़, आपाधापी, तरह-तरह के करतबों आदि की गति तो दिखती है, पर गंतव्य का पता नहीं । जब उपन्यासकार गुरुजी के जरिए यह बात कहता है कि 'बाहर कहाँ तक निकलते । बाहर का क्या कोई अंत है ?', तो उनकी अंतर्यात्रा और आंतरिकता, दोने के मानी समझ में आते हैं । भीतर की यात्रा कर सकने वाला व्यक्ति ही जीवन-यथार्थ को, उसकी उलझनों, परेशानियों को, उसके मंगल- अमंगल को, भावना से आगे जाकर विवेक के भरोसे समझ कर उसका कोई हल पा सकता है । विनोद कुमार शुक्ल को पढ़ते हुए यह धारणा बलवती होती है कि मनुष्य की अधिकांश गतिविधियाँ पारिवारिक और सामूहिक होती हैं और इस नाते सामाजिक होती हैं । आधुनिकता के विचार ने, या यों कहें कि औद्योगिक-विकास या पूँजीवादी-सभ्यता ने मनुष्य की सामूहिकता को, पारिवारिकता के दायरे को तहस-नहस कर, व्यक्ति को अकेले विनष्ट होने के लिए छोड़ दिया । भीतरी

खालीपन और बाहरी अकेलापन इस सभ्यता के फलित रूप हैं । व्यक्ति के जीने और होने की अर्थहीनता, उद्देश्यहीनता को यह सभ्यता विकसित करती है और इसी को विकास कहती है । सामुदायिकता वाले समाजों में जीने रचने वाले लोगों के बीच, पहले व्यक्ति, फिर घर, फिर परिवार को नष्ट करने के पीछे इस सभ्यता का बहुत बड़ा हाथ है । विनोद कुमार शुक्ल के लेखन का अधिकांश हिस्सा 'घर' को बचाने और पाने का है – वह चाहे कविता में हो अथवा उपन्यासों में । वह घर जिसमें चाँद, सूरज, तारे, आकाश, नदी, झरने, पेड़, पौधे चिड़िया सब घर की चीजों की तरह हैं । परस्पर एक-दूसरे में रची-बसी । घर पर उनकी अनेक कविताएँ हैं । एक कविता है 'दूर से घर को देखना चाहिए' उसकी इन अर्थवान पंक्तियों में मनुष्य कितना व्यापक से व्यापकतर हो सकता है, देखना चाहिए : घर में अन्न-जल होगा कि नहीं की चिंता पृथ्वी में अन्न-जल की चिंता होगी पृथ्वी में कोई भूखा घर में भूखा जैसा होगा और पृथ्वी की तरफ़ लौटना घर की तरफ़ लौटने जैसा । घर का हिसाब-किताब इतना गड़बड़ है कि थोड़ी दूर पैदल जाकर घर की तरफ़ लौटता हूँ जैसे पृथ्वी की तरफ़ । उनके उपन्यासों 'नौकर की क़मीज़' 'दीवार में एक खिड़की रहती थी'और 'खिलेगा तो देखेंगे' में 'घर' के एक नहीं अनेक, बहुविध दृश्य, अपने सुख, दुःख और संघर्ष के साथ महत्व पाते हैं । 'दीवार में एक खिड़की रहती थी' सुखद दांपत्य अथवा इससे आगे बढ़कर कहें तो स्वकीया प्रेम का विरल महाकाव्यात्मक उपन्यास है । इस उपन्यास को लिखने के बाद उन्होंने कहा था – 'मैंने सुख लिखा है । इसके पहले'नौकर की क़मीज़' में वह 'दुःख' लिख चुके थे । 'खिलेगा तो देखेंगे' में वे दाम्पत्य-प्रेम के दोनों पहलुओं – स्वकीया और परकीया – का चित्रण करते हैं । आलोचकों ने इस दृष्टि से इन उपन्यासों का का पाठ और विवेचन संभवतः नहीं किया है । उनके अन्य उपन्यास 'दीवार में एक खिड़की रहती थी' के रघुबर प्रसाद और सोनसी के स्वकीया प्रेम की व्याख्या तो हुयी भी है पर

'खिलेगा तो देखेंगे' के गुरुजी के 'स्वकीया' और जिवराखन की पत्नी डेरहिन के 'परकीया' प्रेम की व्याख्या नहीं हुई है । उपन्यासकार ने 'रेडियो' के प्रतीक के सहारे, जिस कलात्मक ख़ूबी के साथ डेरहिन के परकीया प्रेम को रचा है वह अनोखा है । जहाँ डेरहिन के पति जिवराखन को 'घर की गाय खोलना और बाँधना नहीं आता था, वहीं डेरहिन को बजता हुआ रेडियो बंद करना नहीं आता था । इसके चलते, "डेरहिन रेडियो बंद करवाने के लिए घर से बाहर निकल जाती कि कोई मिल जाता और रेडियो बंद कर देता ।...उसे बूढ़े दिखते । जवान लोगों से कहने में डेरहिन को संकोच नहीं था । बड़े-बूढ़ों का लिहाज़ होता । किसी एक युवा को बार-बार रेडियो बंद करने को कहो तो उससे प्रेम होने का डर था ।" जिवराखन ने बहुत कोशिश की कि वह उसे रेडियो चलाना-बंद करना सिखा सके "बहुत प्रेम के समय अकेले में वह डेरहिन को रेडियो चलाना सिखाता था परंतु उससे नहीं बना । जिवराखन को लगता था कि अगर डेरहिन रेडियो सीख लेती तो वह उससे प्रेम करता ।" पर दुर्भाग्य से न तो डेरहिन रेडियो चलाना-बंद करना सीख पाती है और न ही जिवराखन गाय बाँधना । अंततः एक दिन रेडियो बंद कराने के बहाने डेरहिन बाहर निकलती है और कभी भी लौट कर नहीं आती है । 'रेडियो' विनोद कुमार शुक्ल के उपन्यासों में तो प्रतीकात्मक महत्व तो रखता ही है, उनके निजी जीवन में भी वह कम महत्व नहीं रखता । अपनी बेरोज़गारी के दिनों में टाइपिंग और रेडियो सुधारने का काम वे इसलिए सीखते हैं कि कुछ कमा सकें । नौकर की क़मीज़ में संतू बाबू का दोस्त सम्पत पाठकों को याद होगा, जो रेडियो सुधारना सीखता है ताकि उसकी आर्थिक स्थिति सुधर सके । वस्तुतः विनोद कुमार शुक्ल प्रचलित फ़ैशन और बार-बार घिसे जा रहे मुहावरों के वृत्त से बाहर के रचनाकार हैं । मानव-समाज की प्रत्यक्ष बाह्य- प्रवृत्तियों के मूल कारणों की तलाश वे आंतरिक-वृत्तियों में करते हैं । इस ख़ोज में वे कई बार वस्तुओं और व्यक्तियों के बारे में अपरीक्षित किन्तु चिर-परिचित मान्यताओं से भिन्न संसार में चले जाते हैं । यह संसार एक अलग तरह की दृष्टि और धारणा से अपने को जानने-पहचानने और पाने की माँग रखता है । विनोद कुमार शुक्ल का कलाकार मन चुपचाप, एकबारगी इस माँग को मानकर, अब तक के सभी आवेगों-संवेगों, घातों-प्रतिघातों-संघातों को तिरोहित कर उसमें अपने को

निमग्न कर देता है । बचा रह जाता है एक स्थिर, शांत, जिज्ञासु सूक्ष्म निरीक्षण कर्ता । आज जहाँ कविता और उपन्यास दोनों में, अवांछित विवरण, ब्यौरे, कथन आदि की बढ़ोत्तरी हुयी है, विनोद कुमार शुक्ल प्रायः यह नहीं करते । नौकर की क़मीज़ में एक बड़े बूढ़े का कथन याद आता है, 'उतनी ही आग और लकड़ी इकट्ठी करो, जितनी खाना बनाने के लिए ज़रूरी है ।' विनोद कुमार शुक्ल की रचनाओं के सौन्दर्य और जीवन-दृष्टि का यही सूत्रवाक्य है । नौकर की क़मीज़ में 'क़मीज़' एक ऐसा निर्मित खाँचा-साँचा है, जिसमें फिट होकर आदर्श नौकरों की पहचान सुनिश्चित होती है । संतू बाबू का, अंदर-बाहर इसी बात की लेकर संघर्षरत रहता है कि उन्हें न तो नौकर के लिए बनवाई गयी उक्त क़मीज़ में फिट होना है और न ही कार्यालयी-संस्कृति और व्यवस्था की क़मीज़ में । उपन्यास में, सरकारी दफ्तरों के बड़े साहब, बड़े बाबू, बाबू, वकील, डॉक्टर, सेठों और साहूकारों के दोहरे जीवन से लेकर बड़े किसान, छिटका बोनेवाले छोटे किसान, महंगू, ढ़ोर बाज़ार, नौकर बाज़ार, रेज़ा मजदूर, खोमचेवाला, माली, चौकीदार, खजुआ मोची आदि चरित्रों की जो छवियाँ उपन्यासकार उकेरता है, वह वर्णनात्मक की जगह दृशयात्मक प्रभाव छोड़ती हैं । विनोद कुमार शुक्ल के उपन्यासों में व्यक्ति चरित्रों के साथ वस्तु-जगत की एक-एक चीज़ों का जिस तरह से सूक्ष्म निरीक्षण और चित्रण होता है, उससे पता चलता है कि वे प्रकृति और मनुष्य के स्वभाव और अभिव्यक्ति के कितने कुशल चितेरे हैं । इन चित्रों में लफ़्ज़ों की नहीं बल्कि लफ़्ज़ों की काया में वास करने वाले रंगों के सहारे मनुष्य के जिन मनःस्थितियों और तद्जनित सामाजिक अभिव्यक्तियों की उद्भावना वे कर पाते हैं, जिस तरह के दृश्य-बिम्ब वे रचते हैं, वे चित्र और चरित्र, वे दृश्य-बिम्ब विरल और विलक्षण होते हैं । विनोद कुमार शुक्ल को पढ़ने की बाद यह पता चलता है कि भाषा के इस स्तर को अनुभवात्मक अथवा कहें आत्मचेतस होकर ही प्राप्त किया जा सकता है । वस्तुजगत से व्यक्ति का प्रत्यक्ष संबंध भाषा के द्वारा ही होता है, किन्तु भाषा मनोमूलक ही होती है । 'दीवार में एक खिड़की रहती थी' इस मनोमूलक भाषा का सबसे सुंदर नमूना है । विष्णु खरे का कथन याद आ रहा है, "यहाँ (दीवार में एक खिड़की रहती थी) भाषा कई-कई स्तरों पर अपने प्रयोग की प्रविधियों को स्वयं दर्शाती है । भाषा सिर्फ मुँह से कहे गए मनोभावों को प्रकट करने का माध्यम भर नहीं है बल्कि वह

मन की आकांक्षाओं और न कही गई बातों को भी प्रकट करने का माध्यम बन सकती है, यह इस उपन्यास को पढ़कर ही समझ में आता है ।" उपन्यास से एक उद्धरण इस बात को समझने में शायद बेहतर ढंग से मदद कर सके - "हाथी पर बैठे हुए रघुवर प्रसाद ने देखा कि एक साइकिल हाथी से आगे निकल गई । एक छोटे कद के भूरे रंग के घोड़े पर, गाँव का एक बूढ़ा आगे-आगे चला जा रहा था । जब हाथी चलते-चलते घोड़े के बराबर आया तो घोड़ा चौंक गया । घोड़ा का बूढ़ा सवार लगाम छोड़े तब ऊँघता हुआ बैठा था । जैसे-तैसे लगाम पकड़कर घोड़े को उसने काबू में किया । बूढ़ा सवार तब हाथी के पीछे हो गया था और धीरे-धीरे उसी तरह घोड़े पर बैठे जा रहा था जैसे पहले आगे जा रहा था । जाने की वही उसकी लय हो गई जो पहले थी । यह लय धीरे-धीरे समय बीतने की लय थी । गर्मी की दोपहर जैसे धीरे-धीरे बीतती है । दोपहर अभी हुई नहीं थी पर घोड़े की चाल देखकर लगता था कि उसका गाँव कितना भी समीप हो उसे रास्ते पर दोपहर जरूर मिलेगी । आगे कहीं दोपहर घोड़े के आने का रास्ता खड़े- खड़े देख रही होगी । घोड़ा जैसे ही उसके पास आएगा, दोपहर होकर उसके साथ चलने लगेगी । चलते-चलते वह बीत जाएगी और आगे रात चलेगी और यह सिलसिला कई रात कई सुबह तक चलता रहेगा ।" उपन्यास की संरचना में 'काल' जैसी अवधारणा को पकड़ने और समझने के लिए उपर्युक्त उद्धरण कितना उपयोगी है – 'यह लय धीरे-धीरे समय बीतने की लय थी' अथवा यह वाक्य 'यह सिलसिला कई रात कई सुबह तक चलता रहेगा'कथा की उस बुनियादी वाचिक परंपरा की आधुनिक निर्मिति है । समय को चलते हुए, बीतते हुए, फिर आते हुए को 'दृश्य' में पकड़ने की यह कला भाषा में ही संभव होती है । इसलिए जिसे यथार्थ कहा जाता है वह भाषा का विकल्प नहीं बल्कि भाषा में ही संपुंजित होता है । शब्दों में कम चित्रों, बिंबों और दृश्यों में ही वह संज्ञा और क्रिया दोनों को देखने और रचने के कलाकार थे । हमारे यहाँ हिन्दी विभाग में सालों पहले वे आए थे । मुझे याद है, बातचीत में उन्होंने कहा था कि वह वस्तु-जगत को शब्दों में नहीं दृश्यों में देखते हैं । विनोद कुमार शुक्ल मूलतः सभ्यता और संस्कृति के विकास क्रम में, शाश्वत प्रवृत्तियों और सवालों को तलाशने और रचने वाले कवि कथाकार हैं । ऐसे में यह कहना कि वह समकालीन प्रश्नों से बचकर एक अलग लोक में रमें कवि कथाकार हैं, उचित नहीं । हाँ, यह ज़रूर है कि रस्मी तौर पर निपट वर्तमान के सवालों से वे अपने को 'डिसकंटेंट'(आरोपित विषय-वस्तु का नकार) करने वाले कवि- कथाकार हैं । वह मानव-समाज की प्रत्यक्ष बाह्य-प्रवृत्तियों के मूल कारणों की तलाश आंतरिक-वृत्तियों में करते हैं । इस ख़ोज में वे कई बार वस्तुओं और व्यक्तियों के बारे में अपरीक्षित किन्तु चिर-परिचित मान्यताओं से भिन्न संसार में चले जाते हैं । यह संसार एक अलग तरह की दृष्टि और धारणा से अपने को जानने-पहचानने और पाने की माँग रखता है । विनोद कुमार शुक्ल का कलाकार मन चुपचाप, एकबारगी इस माँग को मानकर, अब तक के सभी आवेगों-संवेगों, घातों-प्रतिघातों-संघातों को तिरोहित कर उसमें अपने को निमग्न कर देता है । बचा रह जाता है एक स्थिर, शांत, जिज्ञासु सूक्ष्म भोक्ता और द्रष्टा । मुंडकोपनिषद में वर्णित 'द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया' के जोड़े पक्षी की तरह । अपनी रचना प्रक्रिया पर बात करते हुए विनोद कुमार शुक्ल कहते हैं : "प्रत्येक रचना अपनी रचना-प्रक्रिया साथ लेकर आती है और उस रचना के समाप्त होने पर वह रचना-प्रक्रिया भी समाप्त हो जाती है ।...रचना-प्रक्रिया, रचना में चिह्न की तरह दिखाई देती है ।...सहज कविताएँ लिखना कठिन काम होता होगा, नहीं tो कोई जानबूझकर असहज नहीं होता है । मुझे नहीं मालूम कि मेरे सामने वह जो नीम का पेड़ है, उसे मैं सहज पेड़ कहूँ या वह कितना असहज है । लेकिन रचना में वह एक कठिन पेड़ की तरह उगा होता है । मैं, ज़िंदगी की धूप में, रचना के बाहर जितनी देर पेड़ की छाया में सुस्ताता हूँ, उतना ही रचना के अंदर के पेड़ की छाया में भी । यह मैं अपनी ही रचना के पेड़ के बारे में नहीं कह रहा, यह किसी भी रचना के पेड़ के बारे में है । यह कितना कठिन है कि एक-एक हरे- भरे पेड़ की, एक-एक पत्ती को मैं गिनता हूँ, लगाता हूँ और असंख्य होने के बावजूद एक भी पत्ती मुझे अतिरिक्त नहीं मिलती । मुझे ज़िंदगी के मरुथल में, रेत के ऊपर पड़ी हुयी एक भी हरी पत्ती नहीं मिलती, किन्तु हरी पत्ती का आश्चर्य मिलता है । हरी पत्ती का आश्चर्य मिलता है, तो ही हरे पेड़ का आश्चर्य मिलता है । विनोद कुमार शुक्ल की पहचान हिन्दी साहित्य में एक विरल और विलक्षण कवि व कथाकार के रूप में अमिट बनी रहेगी । अपनी कविताओं और उपन्यासों को फैंटेसी और यथार्थवाद या जादुई यथार्थवाद के शिल्प में ढाले बिना ही यथार्थ को कल्पना में, कल्पना को यथार्थ और जादुई बना देने की रचनात्मक प्रतिभा उनके भीतर थी । उनकी कविताएँ और उनके उपन्यास, उनकी इस कलात्मक

क्षमता और प्रतिभा के प्रमाण हैं । कहना न होगा कि आचार्य जी की कविताओं और उपन्यासों का 'पाठ' करते समय उसका अर्थ करने से ज़्यादा ज़रूरी यह हो जाता है कि उनमें अंतर्निहित सामाजिक-सांस्कृतिक के आद्य-रूपों, प्रतीकों और संकेतों की निर्मिति को समझा जाए, जिनसे अर्थ ग्रहण संभव होता है । इसलिए विनोद जी के यहाँ साहित्य का अर्थ, शब्दार्थ में नहीं बल्कि शब्द के सौंदर्यात्मक, नैतिक और आध्यात्मिक संवेदनों में होता है, जिनसे शब्द अर्थ पाते हैं । 'खिलेगा tो देखेंगे' उपन्यास में ही आए सूरज, चंदा, रेडियो, बिन सुईयों की टिक-टिक करती घड़ी, ठाँय बोलते ही चल जाने वाली काठ की बंदूक और उससे मर जाने वाले लोग, चिड़िया, पीपल का पेड़, रेलगाड़ी, अठन्नी सिक्का आदि वस्तुएँ केवल वस्तु भर नहीं हैं । अपनी प्रतीकात्मकता में वे एक पूरी सामाजिक-सांस्कृतिक और आर्थिक संरचना के अर्थगर्भी चरित्र हैं । जीते-जागते चरित्रों की तरह, उनके सहजीवी चरित्र । इन चरित्रों के ज़रिए आप मानव जीवन की उन अनेक सिम्तों को अनुभव कर सकते हैं जो किसी भी व्यक्ति और समाज के जीवन जीने की प्रक्रिया सुख-दुःख, उमंग-उत्साह, आशा-निराशा, संघर्ष-उपलब्धि आदि की अभिव्यक्ति होते हैं । अब वे हमारे बीच नहीं हैं । पर अपने समृद्ध, समर्थ और मूल्यवान लेखन के दम पर, वह सदा अपने पाठकों के बीच ज़िंदा रहेंगे : 'जाते-जाते कुछ भी नहीं बचेगा जब/तब सब कुछ पीछे बचा रहेगा । इसी बीच रामशंकर द्विवेदी, अवधेश प्रीत, राजी सेठ, गोबिंद प्रसाद, नासिर अहमद सिकंदर, सच्चिदानन्द सिन्हा, राम वी. सुतार जैसे लेखक, चिंतक और कलाकार हमें अलविदा कह चले । पक्षधर की ओर से उन सभी को हमारी श्रद्धांजलि ।

- विनोद तिवारी